ये स्वतंत्रता नहीं स्वच्छंदता पर रोक है
क्या भारत की संप्रभुता खतरे में है? क्या यहाँ का नागरिक या संस्था स्वतंत्र है – अपनी अभिव्यक्ति से राष्ट्र की आतंरिक या बाह्य सुरक्षा से खेलने के लिए? बड़ा आश्चर्य होता है तब, जब लगभग पांच सौ साल मुस्लिम शासन और लगभग एक सौ साल के अंग्रेजी हुकूमत के दौरान साँसों पर भी प्रतिबन्ध झेल चुका ये देश निरोध और प्रतिरोध का फर्क समझने में आज भी कमोबेश नाकामयाब है|
प्रख्यात राजनीतिक चिन्तक एल. टी. हॉबहाउस ने अपनी पुस्तक ‘द एलिमेंट ऑफ़ सोशल जस्टिस’ में लिखा है: एक व्यक्ति या संस्था की निरंकुश स्वतंत्रता का अर्थ होगा कि बाकी सब घोर पराधीनता की बेड़ियों से जकड़े जाएँ | अतः दूसरी ओर से देखा जाय तो सबको स्वतंत्रता तभी प्राप्त हो सकती है जब सब पर कुछ-कुछ प्रतिबन्ध लगा दिये जायें!
प्रश्न है कि क्या एक टेलीविज़न चैनल देश के हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करता है? अगर हाँ, तो प्रणय रॉय ही सुल्तान-ए-हिन्द होते! पठानकोट हमले पर एनडीटीवी के रिपोर्टिंग में क्या संतुलित दीखता है उनको? ऑपरेशन की लाइव कमेंटरी? या फिर हमले में मारे गए जवानों को एक दिन बाद शहीद कह कर पुकारना? या फिर जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसे ‘संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोपित’ को धवल-चरित्र बताने के लिए विरोध में स्क्रीन काला कर लेना?
ये सच है कि पत्रकारिता का काम ही छिपे हुए तथ्यों को समाज के सामने प्रकाशित करना है| पर किस उद्देश्य के लिए? अंधे की लाठी के समान समाज तो धनात्मक दिशा प्रदान करने के लिए, या फिर कलियुगी शुक-सारंग की तरह शत्रुओं को अपने देश के मर्मस्थल का पता देने के लिए! पत्रकार सदैव इस देश के राजनेताओं के दामन दागदार होने की बात करते हैं, पर क्या उनके दामन दूध से धुले हैं? या फिर उनके दाग अच्छे हैं? या ‘पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया’ से ग्रस्त माइक, कैमरा, और पैसे से किसी दूसरी दुनिया से आए हैं ये लोग?
न्यूनतम ज्ञान से अधिकतम लाभ लेना मीडिया घरानों का उसूल बन चुका है| एडिटोरियल का एडवर्टिजमेंट से घालमेल कराकर इनलोगों ने एक नई शुरुआत तक कर दी: ‘एडवर्टोरियल’ के नाम से| क्या मसाज पार्लर और पोर्न चैट के विज्ञापनों को प्रकाशित करने में अभिव्यक्ति की आज़ादी बरक़रार रहती है, पर देश के सैनिकों की कारर्वाई की गोपनीयता प्रकाशित करने पर रोक लगाने से नहीं? शायद ऐसे ही कुछ कारण हैं कि देश की नई पीढ़ी स्वयं को अख़बारों और चैनलों की दुनिया से दूर होते जा रहे हैं – व्यापार, मनोरंजन और खेल की खबरों को छोड़कर!
देश के आम आदमी विचारों को व्यक्त करने की आजादी संविधान में मौलिक अधिकार है| लेकिन संविधान के ही तहत इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का राज्य को अधिकार भी दिया गया है| देश में शिक्षा और चेतना के मौजूदा स्तर को देखते हुए स्वतंत्रता को स्वच्छंदता में तब्दील होने की छूट नहीं दी जा सकती है| इसलिए संसद को कानून बनाकर इस बारे में स्थिति स्पष्ट करनी होगी| खासकर देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, सामाजिक चेतना जैसे संवेदनशील पहलुओं को देखते हुए तकनीकी प्रसार को रोकने के बजाय इसे बेकाबू होने से रोकने के उपाय करना वक्त की मांग है|
No comments:
Post a Comment