मैं वामपंथी नहीं हूँ और न ही दक्षिणपंथी बनने की अभिलाषा रखता हूँ| पर मैं प्रगतिवादी अवश्य हूँ – थोड़ा-बहुत प्रयोगवादी भी| पर प्रगति और प्रयोग दोनों की सीमाएं हैं और होनी भी चाहिए! ‘राजधर्म’ से लेकर ‘नोटबंदी’ तक नरेन्द्र मोदी ने जो प्रयोग किये हैं और उससे जो प्रगति हुई है, उससे उन्होंने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि ‘द्वारकाधीश वासुदेव’ बनने के चक्कर में वे ‘पौन्ड्रक वासुदेव’ बनते जा रहे हैं - चाटुकारों से घिरे हुए मदान्ध व्यक्ति की तरह – उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी की भाषा में ‘परम’ की तरह!
क्या किसी राजनेता या प्रधानमंत्री को अख्तियार है कि वो देश को एक झटके में पाषाण युग में ठेल दे - मुद्रा की खोज के पहले के जमाने में। आज का समय जब भी इतिहास के पन्ने में अंकित होगा कि कैसे एक प्रधानमंत्री ने भारत को इक्कीसवीं सदी से रातोरात पाषाण युग में पहुंचा दिया| इसकी तुलना केवल भारत विभाजन की त्रासदी से की जा सकती है।
मेरे एक अग्रज मित्र हैं! बिहार के एक कस्बे में प्राध्यापक हैं, अब डेढ़ लाख रुपये करीब वेतन पाते होंगे! दोनों बच्चे अपनी मंजिल पा चुके हैं! दिन भर में दो या तीन घंटी, बाकी समय फेसबुक पर मोदीनामा लिखना! उनका मानना था कि मोदी के इस नोटबंदी से जिसको भी घाटा हो रहा हो – अमीर हो या गरीब – भांड में जायें! मेरे मित्र जैसे आत्मग्रस्त मध्यवर्ग – जिसको मोदी के चेहरे में भारत के तकदीर को बदलने की रेखा दीखती है - को उस हिंदुस्तान का कुछ अता पता नहीं है , जिसकी अस्सी फीसदी आबादी बीस रुपए रोज से कम की कमाई पर ज़िंदा है। इस अस्सी फीसदी को रोटी , दवाई और सबसे जरूरी चीज - भारत का नागरिक होने के बुनियादी अधिकार की गारंटी - से महरूम कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सही नाम दिया है । यह कार्पेट बॉम्बिंग है, अमीरों और कालाबाज़ारियों की तरफ से ईमान की रोटी खाने वाले गरीब अवाम पर। कोई भी सरकारी प्रचार इस तक़लीफ़ पर मरहम नहीं लगा सकता।
मोदी के इस कदम के शान में कसीदे गढ़ने वाले इन लोगों को यह पता नहीं है कि भारत को ऐसी तानाशाही बर्दाश्त करने का अनुभव नहीं है। अन्यथा, क्या औरंगजेब अकबर से कम था क्या? अंग्रेजों ने भी पुचकार कर ही इस देश में प्रवेश किया था| मैकियावेली ने कहा है कि राजा को सामान्य नागरिको की संपत्ति पर कठोरता नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि वे पिता की मृत्यु भूल जाते हैं, उनका पितृत्व नहीं!
मोदीजी ने नए नोट पर राष्ट्रपिता के चेहरे को उलट दिया है| कहीं ‘बापू’ के खून-पसीने से सिंचित भारत की गरीब जनता जवाब देने पर उतर आई तो आप इसका उल्टा ‘पूबा’ खायेंगे मोदीजी।
क्या किसी राजनेता या प्रधानमंत्री को अख्तियार है कि वो देश को एक झटके में पाषाण युग में ठेल दे - मुद्रा की खोज के पहले के जमाने में। आज का समय जब भी इतिहास के पन्ने में अंकित होगा कि कैसे एक प्रधानमंत्री ने भारत को इक्कीसवीं सदी से रातोरात पाषाण युग में पहुंचा दिया| इसकी तुलना केवल भारत विभाजन की त्रासदी से की जा सकती है।
मेरे एक अग्रज मित्र हैं! बिहार के एक कस्बे में प्राध्यापक हैं, अब डेढ़ लाख रुपये करीब वेतन पाते होंगे! दोनों बच्चे अपनी मंजिल पा चुके हैं! दिन भर में दो या तीन घंटी, बाकी समय फेसबुक पर मोदीनामा लिखना! उनका मानना था कि मोदी के इस नोटबंदी से जिसको भी घाटा हो रहा हो – अमीर हो या गरीब – भांड में जायें! मेरे मित्र जैसे आत्मग्रस्त मध्यवर्ग – जिसको मोदी के चेहरे में भारत के तकदीर को बदलने की रेखा दीखती है - को उस हिंदुस्तान का कुछ अता पता नहीं है , जिसकी अस्सी फीसदी आबादी बीस रुपए रोज से कम की कमाई पर ज़िंदा है। इस अस्सी फीसदी को रोटी , दवाई और सबसे जरूरी चीज - भारत का नागरिक होने के बुनियादी अधिकार की गारंटी - से महरूम कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सही नाम दिया है । यह कार्पेट बॉम्बिंग है, अमीरों और कालाबाज़ारियों की तरफ से ईमान की रोटी खाने वाले गरीब अवाम पर। कोई भी सरकारी प्रचार इस तक़लीफ़ पर मरहम नहीं लगा सकता।
मोदी के इस कदम के शान में कसीदे गढ़ने वाले इन लोगों को यह पता नहीं है कि भारत को ऐसी तानाशाही बर्दाश्त करने का अनुभव नहीं है। अन्यथा, क्या औरंगजेब अकबर से कम था क्या? अंग्रेजों ने भी पुचकार कर ही इस देश में प्रवेश किया था| मैकियावेली ने कहा है कि राजा को सामान्य नागरिको की संपत्ति पर कठोरता नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि वे पिता की मृत्यु भूल जाते हैं, उनका पितृत्व नहीं!
मोदीजी ने नए नोट पर राष्ट्रपिता के चेहरे को उलट दिया है| कहीं ‘बापू’ के खून-पसीने से सिंचित भारत की गरीब जनता जवाब देने पर उतर आई तो आप इसका उल्टा ‘पूबा’ खायेंगे मोदीजी।