Thursday, November 17, 2016

नोटबंदी: चाटुकारों से घिरे एक मदान्ध व्यक्ति का तुगलकी फरमान

मैं वामपंथी नहीं हूँ और न ही दक्षिणपंथी बनने की अभिलाषा रखता हूँ| पर मैं प्रगतिवादी अवश्य हूँ – थोड़ा-बहुत प्रयोगवादी भी| पर प्रगति और प्रयोग दोनों की सीमाएं हैं और होनी भी चाहिए! ‘राजधर्म’ से लेकर ‘नोटबंदी’ तक नरेन्द्र मोदी ने जो प्रयोग किये हैं और उससे जो प्रगति हुई है, उससे उन्होंने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि ‘द्वारकाधीश वासुदेव’ बनने के चक्कर में वे ‘पौन्ड्रक वासुदेव’ बनते जा रहे हैं - चाटुकारों से घिरे हुए मदान्ध व्यक्ति की तरह – उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी की भाषा में ‘परम’ की तरह!

क्या किसी राजनेता या प्रधानमंत्री को अख्तियार है कि वो देश को एक झटके में पाषाण युग में ठेल दे - मुद्रा की खोज के पहले के जमाने में। आज का समय जब भी इतिहास के पन्ने में अंकित होगा कि कैसे एक प्रधानमंत्री ने भारत को इक्कीसवीं सदी से रातोरात पाषाण युग में पहुंचा दिया| इसकी तुलना केवल भारत विभाजन की त्रासदी से की जा सकती है।

मेरे एक अग्रज मित्र हैं! बिहार के एक कस्बे में प्राध्यापक हैं, अब डेढ़ लाख रुपये करीब वेतन पाते होंगे! दोनों बच्चे अपनी मंजिल पा चुके हैं! दिन भर में दो या तीन घंटी, बाकी समय फेसबुक पर मोदीनामा लिखना! उनका मानना था कि मोदी के इस नोटबंदी से जिसको भी घाटा हो रहा हो – अमीर हो या गरीब – भांड में जायें! मेरे मित्र जैसे आत्मग्रस्त मध्यवर्ग – जिसको मोदी के चेहरे में भारत के तकदीर को बदलने की रेखा दीखती है - को उस हिंदुस्तान का कुछ अता पता नहीं है , जिसकी अस्सी फीसदी आबादी बीस रुपए रोज से कम की कमाई पर ज़िंदा है। इस अस्सी फीसदी को रोटी , दवाई और सबसे जरूरी चीज - भारत का नागरिक होने के बुनियादी अधिकार की गारंटी - से महरूम कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सही नाम दिया है । यह कार्पेट बॉम्बिंग है, अमीरों और कालाबाज़ारियों की तरफ से ईमान की रोटी खाने वाले गरीब अवाम पर। कोई भी सरकारी प्रचार इस तक़लीफ़ पर मरहम नहीं लगा सकता।

मोदी के इस कदम के शान में कसीदे गढ़ने वाले इन लोगों को यह पता नहीं है कि भारत को ऐसी तानाशाही बर्दाश्त करने का अनुभव नहीं है। अन्यथा, क्या औरंगजेब अकबर से कम था क्या? अंग्रेजों ने भी पुचकार कर ही इस देश में प्रवेश किया था| मैकियावेली ने कहा है कि राजा को सामान्य नागरिको की संपत्ति पर कठोरता नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि वे पिता की मृत्यु भूल जाते हैं, उनका पितृत्व नहीं!

मोदीजी ने नए नोट पर राष्ट्रपिता के चेहरे को उलट दिया है| कहीं ‘बापू’ के खून-पसीने से सिंचित भारत की गरीब जनता जवाब देने पर उतर आई तो आप इसका उल्टा ‘पूबा’ खायेंगे मोदीजी।

Saturday, November 12, 2016

एक पाती मोदी के नाम: गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए

एक पाती मोदी के नाम: गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए

प्रिय नरेन्द्र मोदीजी,
आप तो हिला दिए! बैंकों के बाहर की कतारें और उनमें परेशान होते मेरे सरीखे हतभागी लोगों को तो वाकई आपने हिला दिया! कसम से किसी भी जगह मुझे एक भी काले धन वाला नजर नहीं आया, बाकी अडानी-अम्बानी तो मेरे पहुँच से बाहिर हैं, आपकी बात आप ही जानें!
लोग कहते हैं कि आपने काला-धन पर सर्जिकल स्ट्राइक किया है मोदीजी, पर कसम आपके गुजरात वाले द्वारकाधीश की, आपका यह निर्णय तो गरीबों को पीछे से पीला कर रहा है!
मैंने अपने छात्र जीवन में एक कविता पढ़ी थी, जिसकी पंक्तियाँ थीं: "सत्ता किरीट मणिमय आसन, करते मानव का तेज हरण! नर विभव हेतु ललचाता है, पर वही मनुज को खाता है!" इसमें विभव की जगह अगर वोट-बैंक रख दें तो एकदम्मे फिट बैठेगा आप पर!
वैसे हम आपके थोड़े-थोड़े फैन रहे हैं, पर अंधेवाले नहीं - काहे कि आप हमरा आ हमारे बच्चे का पेट नहीं भरते हैं! लेकिन ई जो आप सेम-साइड गोल किये हैं न ऊ एकदम्मे नास दिए हैं! अरे भाई, अपने चायवाले का तो सोचा होता जे अपनी बेटी के बियाह आ बच्चों को पढ़ाने के लिए पांच रुपये का सिक्का जमा करके 500 आ 1000 का नोट बनवाए थे! उनको आपने दिया क्या वो तो मैं नहीं जानता, पर पूरा ले मारे हैं - ई सामने है!
कुछ लोगों का मानना है कि ये शुध्दिकरण या धौली टाइप की प्रक्रिया है, जिसमें हमारे सरीखे लोगों को शुरू में कुछ कष्ट अवश्य होगा पर बाद में राष्ट्र का भला होगा! मोदीजी, ई पांच साल आप केवल एक्सपेरिमेंट ही करेंगे या कुछ सरजमीं पर दीखेगा भी? चुनाव के समय सबने पप्पू से डरकर आपको चुना| पर, आप हैं कि घिरे हैं महापुरुषों से – राजनाथ जैसे प्रतापी, जेटली जैसे ईमानदार और स्मृति जैसी साध्वी से!
मोदीजी, आप बाबा विश्वनाथ की काशी से चुनाव जीत के आए हैं, ये याद रखियेगा! ये वही काशी है, जहाँ बाबा विश्वनाथ और काशी नरेश को छोड़कर सब ‘भोंसड़ी के’ हैं – दशाश्वमेध पर! आप अभी तक बचे हैं – माता अन्नपूर्णा की कृपा से इस विभूषण को पाने से, पर इस बार होली में सब क्योटोवाले आपको गालियों का गंगास्नान करा ही डालेंगे!  
चलिए चुनाव २०१९ में है - तब तक हम अपना नमरी गिनते-गिनते भूल जायेंगे, पर उससे पहले अगर ऐसा मिस्टेक किये न त आपकी द्वारिका डूबनी तय है -- गर-गर मोदी के साथ!
मैं जानता हूँ कि मेरा ये पोस्ट देखकर sinister (लेफ्टी के लिए अंग्रेजी का एक प्रचलित शब्द) बहुत खुश होंगे यह कहकर कि एगो भक्त उनकी साइड आ गया, पर आपको मालूम है कि हम इनको लौड़े पर लेकर चलते हैं!
ईश्वर आपको जेटली की केटली से बचाए!
शुभाकांक्षी
संजीव

Saturday, November 5, 2016

एनडीटीवी पर प्रतिबन्ध के सन्दर्भ में

ये स्वतंत्रता नहीं स्वच्छंदता पर रोक है

क्या भारत की संप्रभुता खतरे में है? क्या यहाँ का नागरिक या संस्था स्वतंत्र है – अपनी अभिव्यक्ति से राष्ट्र की आतंरिक या बाह्य सुरक्षा से खेलने के लिए? बड़ा आश्चर्य होता है तब, जब लगभग पांच सौ साल मुस्लिम शासन और लगभग एक सौ साल के अंग्रेजी हुकूमत के दौरान साँसों पर भी प्रतिबन्ध झेल चुका ये देश निरोध और प्रतिरोध का फर्क समझने में आज भी कमोबेश नाकामयाब है|

प्रख्यात राजनीतिक चिन्तक एल. टी. हॉबहाउस ने अपनी पुस्तक ‘द एलिमेंट ऑफ़ सोशल जस्टिस’ में लिखा है: एक व्यक्ति या संस्था की निरंकुश स्वतंत्रता का अर्थ होगा कि बाकी सब घोर पराधीनता की बेड़ियों से जकड़े जाएँ | अतः दूसरी ओर से देखा जाय तो सबको स्वतंत्रता तभी प्राप्त हो सकती है जब सब पर कुछ-कुछ प्रतिबन्ध लगा दिये जायें!

प्रश्न है कि क्या एक टेलीविज़न चैनल देश के हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करता है? अगर हाँ, तो प्रणय रॉय ही सुल्तान-ए-हिन्द होते! पठानकोट हमले पर एनडीटीवी के रिपोर्टिंग में क्या संतुलित दीखता है उनको? ऑपरेशन की लाइव कमेंटरी? या फिर हमले में मारे गए जवानों को एक दिन बाद शहीद कह कर पुकारना? या फिर जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसे ‘संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोपित’ को धवल-चरित्र बताने के लिए विरोध में स्क्रीन काला कर लेना?

ये सच है कि पत्रकारिता का काम ही छिपे हुए तथ्यों को समाज के सामने प्रकाशित करना है| पर किस उद्देश्य के लिए? अंधे की लाठी के समान समाज तो धनात्मक दिशा प्रदान करने के लिए, या फिर कलियुगी शुक-सारंग की तरह शत्रुओं को अपने देश के मर्मस्थल का पता देने के लिए! पत्रकार सदैव इस देश के राजनेताओं के दामन दागदार होने की बात करते हैं, पर क्या उनके दामन दूध से धुले हैं? या फिर उनके दाग अच्छे हैं? या ‘पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया’ से ग्रस्त माइक, कैमरा, और पैसे से किसी दूसरी दुनिया से आए हैं ये लोग?

न्यूनतम ज्ञान से अधिकतम लाभ लेना मीडिया घरानों का उसूल बन चुका है| एडिटोरियल का एडवर्टिजमेंट से घालमेल कराकर इनलोगों ने एक नई शुरुआत तक कर दी: ‘एडवर्टोरियल’ के नाम से| क्या मसाज पार्लर और पोर्न चैट के विज्ञापनों को प्रकाशित करने में अभिव्यक्ति की आज़ादी बरक़रार रहती है, पर देश के सैनिकों की कारर्वाई की गोपनीयता प्रकाशित करने पर रोक लगाने से नहीं? शायद ऐसे ही कुछ कारण हैं कि देश की नई पीढ़ी स्वयं को अख़बारों और चैनलों की दुनिया से दूर होते जा रहे हैं – व्यापार, मनोरंजन और खेल की खबरों को छोड़कर!

देश के आम आदमी विचारों को व्यक्त करने की आजादी संविधान में मौलिक अधिकार है| लेकिन संविधान के ही तहत इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का राज्य को अधिकार भी दिया गया है| देश में शिक्षा और चेतना के मौजूदा स्तर को देखते हुए स्वतंत्रता को स्वच्छंदता में तब्दील होने की छूट नहीं दी जा सकती है| इसलिए संसद को कानून बनाकर इस बारे में स्थिति स्पष्ट करनी होगी| खासकर देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, सामाजिक चेतना जैसे संवेदनशील पहलुओं को देखते हुए तकनीकी प्रसार को रोकने के बजाय इसे बेकाबू होने से रोकने के उपाय करना वक्त की मांग है|